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Principles of Teaching (शिक्षण के सिद्धांत)

क्रियाशीलता अर्थात् करके सीखने का सिद्धांत (Principle of Activity or Learning by Doing) – क्रियाशीलता के सिद्धांत का अर्थ है कि शिक्षक को प्रत्येक प्रकार के पाठ में क्रियाशीलता उत्पन्न करनी चाहिए। क्रियाशीलता दो प्रकार की होती हैं(i) शारीरिक (ii) मानसिक। शारीरिक क्रियाशीलता का अर्थ है विद्यार्थियों की कर्मेन्द्रियों को क्रियाशीलता प्रदान करना तथा मानसिक क्रियाशीलता का तात्पर्य है विद्यार्थियों की ज्ञानेन्द्रियों को क्रियाशील रखना। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रत्येक विद्यार्थी अपने स्वभाव से ही क्रियाशील होता है। अतः सपफल शिक्षण के लिए शिक्षक को विद्यार्थी की रचनात्मकता तथा अन्य मूल प्रवृतियों (Instincts) तथा इन्द्रियों (Sense) का अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए। प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री फ्रोबेल (Froebel) ने इसी बात को ध्यान में रखते हुए करके सिखने (Learing by doing) के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। आधुनिक शिक्षण प्रणालियाँ जसै – मांटेसरी प्रणाली (Montessori Method), किन्डर गार्टन प्रणाली (Kinder Garten Method),अन्वेषण प्रणाली (Heuristic
Method), डालटन प्रणाली (Dalton Method), योजना प्रणाली (Project Method), तथा बेसिक प्रणाली (Basic Method) आदि इसी सिद्धांत पर आधारित है।

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अभिप्रेरणा का सिद्धांत (Principle of Motivation) – अभिप्रेरणा के सिद्धांत का तात्पर्य विद्यार्थियों में ज्ञान प्राप्त करने के लिए रूचि उत्पन्न करना है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जिस समय शिक्षक विद्यार्थियों को ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर देता है तो सीखने और सिखाने की प्रक्रिया सुचारू रूप से सम्पन्न होती रहती है। पर उचित प्रेरणा के अभाव में विद्यार्थी पाठ्य-सामग्री को याद करने में तनिक भी रूचि नहीं लेते। इससे समस्त शिक्षण असपफल हो जाता है। थार्नडाइक का सीखने का तत्परता सिद्धांत (Law of Readiness)

रूचि का सिद्धांत (Principle of Interest) – जब विद्यार्थी को पाठ्य-विषय की रूचि उत्पन्न हो जाती है तो वह ज्ञान को सरलतापूर्वक ग्रहण कर लेता है। विद्यार्थी की जिज्ञासा (Curiosity) को जागृत किया जाए तथा उसे पाठ का उद्देश्य स्पष्ट रूप से ज्ञात हो जाएगा तो विद्यार्थी की पाठ के प्रति रूचि अवश्य जाग्रत हो जाएगी। पाठ्य विषय का विद्यार्थी की क्रियाओं और उद्देश्यों से संबंध स्थापित किया जाए। शिक्षण को विद्यार्थी के सक्रिय जीवन से संबंधित किया जाए। उदाहरण के लिए यदि किसी विद्यार्थी को कविता याद करने में रूचि नहीं है तो उसे अन्त्याक्षरी में भाग लेने का अवसर प्रदान किया जाए। जब वही विद्यार्थी अपनी टोली को हारते हुए देखेगा तो उसमें कविता याद करने की रूचि स्वयं ही उत्पन्न हो जाएगी।

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जीवन से सम्बन्ध स्थापित करने का सिद्धांत (Principle of linking with life)- मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रत्येक स्तर के शिक्षार्थी की अपनी-अपनी दुनियाँ अलग-अलग होती है। प्रत्येक विद्यार्थी केवल उन क्रियाओं अथवा विषयों में ही अधिक रूचि लेता है जिनका इसकी अपनी निजी दुनिया से सम्बन्ध होता है इसी बात को ध्यान में रखते हुए आधुनिक युग में शिक्षण करते समय क्रिया अथवा विषय को सीखने वाले के जीवन से सम्बन्धित किया जाता है। हम सब दिन-प्रतिदिन दिखते हैं कि विद्यार्थी उसी बात को सीखने में रूचि लेते हैं जिनका उनके वर्तमान अथवा भावी जीवन में उपयोग होने की सम्भावना हो। थार्नडाइक का सीखने का उपयोगिता सिद्धांत (Law of Effect

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